Thursday, July 22, 2010

tum

तुम

आँखों में तुम्हारे नाम का
काज़ल
लगा रखा है
मैंने
पांवों में तुम्हारे
नाम के पाजेब
पहन रखे है मैंने
खनकते हो तुम्ही
मेरे हाथों में बनकर कंगन
तुम ही से तो है मेरे
ये सोलह श्रृंगार और दर्पण
पर
पर तुमने तो उतार दिया है मुझे
अपने तन से
पुरानी कमीज़ की तरह

मयूर


4 comments:

  1. Mayur ji , आप अच्छा चिञण करते हैँ।मैँने आपकी दोँनो रचनाऐँ पढ़ी और पाया कि आपकी रचनाओँ की अन्तिम लाईने बहुत प्रभावित करती हैँ।बस धार वाली कलम से लिखते जाईये।.........,..,.......,.....,..,..... -: Visit on my blog :- -( vishwaharibsr.blogspot.com )

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  2. बहुत सुंदर भाव युक्त कविता

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  3. मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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